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विश्व भर में संघर्षो का कारण समुद्री संसाधनों की महत्ता

समुद्री उत्पादों में आत्मनिर्भरता ( घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति ) के अलावा हम प्रतिवर्ष 25,000-30,000 करोड़ रुपए तक का औसतन निर्यात कर सकते हैं

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समुद्र के अन्दर पाए जाने वाले पदार्थों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है- ( 1 ) वृहद् संघटक जैसे- क्लोरीन , सोडियम , मैग्नीशियम , सल्फर , कैल्सियम , पोटैशियम आदि तथा ( 2 ) लघु संघटक जैसे- कार्बन , सिलिकॉन , फॉस्फोरस , आयोडीन , लोहा , ताँबा , सोना इत्यादि . समुद्र वृहद् संघटकों की उपस्थिति अधिक है , जबकि लघु संघटकों की उपस्थिति कम . इसी प्रकार समुद्री संसाधनों को भी दो भागों में बाँटा गया है- ( ) ‘ सजीव संसाधन ‘ , जो समुद्री जीवों से प्राप्त किए जाते हैं , जिनमें मुख्य हैं- मोती , प्रवाल तथा औषधियाँ , ( ii ) निर्जीव संसाधनों में ऊर्जा तथा खनिज शामिल हैं . ऊर्जा परम्परागत तथा गैर – परम्परागत दोनों रूपों में समुद्रों से प्राप्त की जाती हैं . समुद्र से मिलने वाले पेट्रोलियम परम्परागत ऊर्जा का उदाहरण हैं , जबकि गैर – परम्परागत ऊर्जा , समुद्र की लहरों से प्राप्त की जा सकती है . अभी हम समुद्र से गैर – परम्परागत ऊर्जा के दोहन में यथोचित प्रगति नहीं कर पाए हैं . धरती पर बढ़ती खाद्यान्न समस्या निपटने में ‘ समुद्री खेती पर्याप्त सहायक सिद्ध हो सकती है . समुद्री मछलियाँ तो बड़ी मात्रा में भोजन का स्रोत हैं ही , मगर इसके अलावा कई अन्य जीव भी हैं जिनको खेती की तरह पर्याप्त संरक्षण तथा संवर्द्धन देकर बढ़ाया जा सकता है तथा खाद्य पदार्थों के रूप में उनका उपभोग भी किया जा सकता है समुद्री झींगा , फेनी , मोती , सीप , शंखमीन इत्यादि ऐसे ही जीव हैं , जिन्हें खाद्य पदार्थों की खेती के रूप में बढ़ावा दिया जा सकता है . शाकाहारियों के लिए भी समुद्र में विभिन्न

प्रकार के शैवाल , कवक तथा स्पज पाए इन चीजों को खेती के रूप में संरक्षण एवं संवर्द्धन प्रदान कर न सिर्फ अपनी खाद्य तथा पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है बल्कि इनका अधिक उत्पादन मुद्रा अर्जित की जा सकती है . कर निर्यात करके भी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।
एक आंकलन के अनुसार भारत द्वारा प्रतिवर्ष औसतन 10000 करोड़ रुपए मूल्य के समुद्री उत्पादों का निर्यात किया जा रहा है , मगर यह काफी नहीं है क्योंकि भारत के पास इतने समुद्री संसाधन उपलब्ध हैं कि अगर उनके सही संरक्षण – संवर्द्धन – प्रबन्धन तथा दोहन पर ध्यान दिया जाए तो समुद्री उत्पादों में आत्मनिर्भरता ( घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति ) के अलावा हम प्रतिवर्ष 25,000-30,000 करोड़ रुपए तक का औसतन निर्यात कर सकते हैं . समुद्री मछलियों तथा जीवों के अलावा समुद्री वनस्पतियों से अनेक प्रकार की औषधियाँ भी बनाई जा सकती हैं . समुद्री मछलियों से भोजन के अलावा दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले अनेक घरेलू सामान भी बनाए जाते हैं , जैसे – शार्क मछली के चर्म से बनने वाले जूते , पर्श , बटन तथा सजावटी सामान . का उपयोग रंग – रोगन , लिनोलियम तथा उत्पादन में होता है . कुछ सार्डीन , हिल्सा , शार्क आदि समुद्री मछलियों कृत्रिम सामानों समुद्री मछलियों के तेल से मोमबत्ती व साबुन भी तैयार किए जाते हैं . सीपी , शंख , मोती तथा मूंगा की प्राप्ति भी समुद्री जीवों से होती है , यह तो बानगी भर है , सच तो यह है कि समुद्र में इतनी सम्भावनाएं छुपी हुई हैं जो मानव की तमाम आवश्यकताओं को सदियों तक पूरा कर सकती हैं .

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