Daily Current Affairs 15 Jan 2020

Green Credit Scheme


The Forest Advisory Committee, an apex body tasked with adjudicating requests by the industry to raze forest land for commercial ends, has approved a scheme that could allow “forests” to be traded as a commodity.

If implemented, it allows the Forest Department to outsource one of its responsibilities of reforesting to non-government agencies.

The proposed ‘Green Credit Scheme’, as it is called, allows agencies — they could be private companies, village forest communities — to identify land and begin growing plantations.

After three years, they would be eligible to be considered as compensatory forest land if they met the Forest Department’s criteria.

An industry needing forestland could then approach the agency and pay it for parcels of such forested land, and this would then be transferred to the Forest Department and be recorded as forestland.

“The participating agency will be free to trade its asset, that is a plantation, in parcels, with project proponents who need forest land,”

This is not the first time that such a scheme has been mooted.

In 2015, a ‘Green Credit Scheme’ for degraded forest land with public-private participation was recommended, but it was not approved by the Union Environment Minister, the final authority.

Such a scheme will encourage plantation by individuals outside the traditional forest area, which will help in meeting international commitments such as sustainable development goals, and nationally determined contributions.

In the current system, the industry needs to make good the loss of forest by finding appropriate non-forest land equal to that which would be razed.

It also must pay the State Forest Department the current economic equivalent called Net Present Value of the forestland.

It’s then the Forest Department’s responsibility to grow appropriate vegetation that, over time, would grow into forests.

Industries have often complained that they find it hard to acquire appropriate non-forest land, which has to be contiguous to an existing forest.

The Centre had collected nearly ₹50,000 crores over decades, but the funds were lying unspent because States were not spending the money on re-growing forests.

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Climate Change in Hindi


जलवायु परिवर्तन

हाल ही में आईपीसीसी ( IPCC ) द्वारा जलवायु परिवर्तन पर जारी रिपोर्ट ने विश्व समुदाय को इसके प्रति सचेत किया है । IPCC ने ' ग्लोबल वार्मिंग ऑफ 1 . 5°C ' नामक शीर्षक से एक विशेष रिपोर्ट जारी की है । जिसमें वैश्विक तापन की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश । डाला गया है तथा यह बताया गया है कि मानव जनित ग्लोबल वार्मिंग 2017 में ही पूर्व - औद्योगिक स्तर से 1°C के ऊपर पहुंच चुका है ।

इस रिपोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया है कि 2030 - 2052 के बीच इसके 1 . 5°C से ऊपर पहंचने की संभावना है । वैश्विक स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग की इस समस्या को देखते हुए जलवायु परिवर्तन के प्रति समझ और जागरुकता को बढ़ाने की आवश्यकता है ।

जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन का सामान्य अर्थ जलवायवीय दशाओं में आने वाले व्यापक परिवर्तन से है , जो वस्तुतः तापमान , वर्षा आदि के पैटर्न में बदलाव को इंगित करता है ।

- यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है ,जो प्राकृतिक एवं मानवीय कारकों के प्रभाव से घटित होती है ।

प्राकृतिक कारक

(a) सौर कलंकों की मात्रा में वृद्धि ,                (b) सौर विकिरण में विभिन्नता ,

(c) पृथ्वी का अक्षीय झकाव तथा कक्षा परिवर्तन ,

(d) ज्वालामुखी उद्गार ,के                                 (e) महाद्वीपीय विस्थापन ।

जलवायु परिवर्तन वास्तव में एक प्राकृतिक प्रक्रिया है , जो प्रकृति में घटित होती है , परन्तु वर्तमान में मानवीय गतिविधियों ने इस प्रक्रिया को तीव्र कर दिया गया है ।

निम्नलिखित मानवीय गतिविधियों ने इसे प्रभावित किया है :

(a) तीव्र औद्योगीकरण ,                     (b) वनोन्मूलन तथा तीव्र शहरीकरण ,

(c) जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग ,          (d) ग्रीन हाउस गैसों का तीव्र गति से उत्सर्जन ,

(e) भूमि - उपयोग में बदलाव ।

जलवायु परिवर्तन वर्तमान में कई वैश्विक मुद्दों जैसे - गरीबी , आर्थिक विकास , प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ - साथ समुद्री पारितंत्र एवं मानव तथा जीव - जंतुओं के लिए चिंता का विषय है ।

रिपोर्ट के मुख्य तथ्य इस रिपोर्ट में 1 . 5°C तापमान वृद्धि होने से कई प्रभावों जैसे समुद्री स्तर में वृद्धि ,वर्षा की मात्रा में वृद्धि , सुखा एवं बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि , हीट वेव एवं चक्रवातों की तीव्रता में वृद्धि के साथ - साथ महासागरीय अम्लीयता और लवणता में वृद्धि की | प्रबल संभावना व्यक्त की गई है । अगर तापमान में 1 . 5°C से 2°C के बीच वृद्धि होती है तो वह | फसल उत्पादन में कमी को बढ़ाकर 2050 तक गरीबों की संख्या में तीव्र वृद्धि करेगी । प्रवाल भित्तियों में 70 . 90 % के बीच हास होने के साथ - साथ अगर 2°C तक तापमान वृद्धि होती है ,तब लगभग प्रवाल भित्तियों की समाप्ति का अनुमान है । रिपोर्ट में यह बताया गया है कि यदि तापमान को 1 . 5°C पर सीमित करना है तो 2030 तक CO ,उत्सर्जन को 2010 के स्तर से 45 % कम कर 2050 तक निवल शून्य उत्सर्जन ( net Zero emissions ) के स्तर पर लाना होगा । उपर्युक्त रिपोर्ट के आलोक में यह आवश्यक है कि जलवायु परिवर्तन की संकल्पना उसके प्रभाव , चुनौतियां एवं शमन के उपायों को समझा जाए : ताकि विश्व समुदाय इस वैश्विक संकट से निपटने में सक्षम हो सके ।

हरित गृह (ग्रीन हाउस गैस)

गैस वायुमंडल में मौजूद वे गैसें जो सूर्य से आने वाली लघुतरंगों को पृथ्वी के वायुमंडल में रोककर उसे गर्म करने में भूमिका निभाती हैं , हरित गृह गैसें कहलाती हैं ।

1 प्रमुख हरित गृह गैसों में सम्मिलित है

1 .कार्बन डाइऑक्साइड ( CO2 , )                        2 . मिथेन (CH4) ,

3 .नाइट्रस ऑक्साइड (N 2 O) ,

4 .फ्लूरोनिटेड गैस - (क्लोरोफ्लोरो कार्बन , हाइड्रोफ्लोरो कार्बन , परफ्लोरोकार्बन , सल्फर हेक्साक्लोराइड व नाइट्रोजन हाइफ्लोराइड ) ,

5 .हेलोन्स ,                           6 . जलवाष्प ।

पृथ्वी के वायुमंडल में पाई जाने वाली कुछ गैसें सौर विकिरण को धरातल तल पहुंचने में बाधा उत्पन्न नहीं करती हैं । परन्तु वे पृथ्वी से विकरित होने वाली दीर्घ तरंगों को रोककर पुनः भू - सतह पर परावर्तित कर देती हैं । वायुमंडल में घटित होने वाली यह घटना - हरित गृह प्रभाव के नाम से जानी जाती है ।

कार्बन उत्सर्जन

2018 में ऊर्जा की बढ़ती मांग के कारण 1 . 7 % की वृद्धि दर्ज की गई ,जिसमें ऊर्जा क्षेत्र का योगदान दो - तिहाई है । चीन , भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस नेट उत्सर्जन में 85 % का योगदान दिया ; जबकि जर्मनी , जापान , मैक्सिको , फ्रांस तथा ब्रिटेन में CO , उत्सर्जन में गिरावट दर्ज की गई ।

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