Daily Current Affairs 13 Jan 2020

Regional Comprehensive Economic Cooperation - RCEP


4 नवंबर, 2019 को थाईलैंड बैंकॉक में तीसरे ' क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक सहयोग ' अर्थात आरसीईपी (Regional Comprehensive Economic Cooperation - RCEP) की बैठक के दौरान,भारत ने महत्वपूर्ण मुद्दों का समाधान करने तक आरसीईपी में शामिल नहीं होने का फैसला लिया ।

  • वार्ता में शामिल 15 देशों ने 2020 में व्यापक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लिया । इस समझौते के लिए 2013 से वार्ता चल रही थी तथा इसमें भारत सहित कई देश दूसरे देशों के साथ व्यापार टैरिफ से संबंधित समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हैं ।

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक सहयोग ( RCEP )

  • आरसीईपी एक व्यापारिक समझौता है जिसमें दक्षिण - पूर्वी एशियाई देशों के संगठन ( आसियान ) के 10 सदस्य देश और आसियान ब्लॉक के साथ मुक्त व्यापार समझौते ( free trade agreements ) करने वाले छह देश शामिल हैं ।
  • आसियान के अंतर्गत ब्रूनेई , कंबोडिया , इंडोनेशिया , लाओस , मलेशिया , म्यांमार , फिलीपींस , सिंगापुर , थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं । जबकि भारत , ऑस्ट्रेलिया , चीन , दक्षिण कोरिया , जापान और न्यूजीलैंड आसियान ब्लॉक के साथ एफटीए करने वाले देश हैं ।

महत्व

  • आरसीईपी के अंतर्गत सभी 16 देशों में फैले हुए बाजार को एकीकृत बाजार के रूप में विकसित किया जाएगा ,ताकि पूरे क्षेत्र में इन सभी 16 देशों के उत्पाद एवं सेवा ( service ) आसानी से उपलब्ध हो । इस व्यापारिक समझौते द्वारा विश्व का सबसे बड़ा व्यापारिक देशों में विश्व की आधी आबादी रहती है तथा वैश्विक जीडीपी में 25 प्रतिशत के वैश्विक व्यापार में लगभग एक तिहाई ( 30 प्रतिशत ) की तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ( एफडीआई ) प्रवाह में 26 प्रतिशत की भागीदारी है ।

भारत ने आरसीईपी समझौते से हटने का फैसला क्यों लिया ?

आर्थिक मंदी

भारत की अर्थव्यवस्था कठिन समय से गुजर रही है । जनवरी - मार्च 2018 से लगातार पांच तिमाहियों तक जीडीपी की वृद्धि दर धीमी रही है ।

  • ऐसे प्रतिकूल समय में आरसीईपी जैसे मुक्त व्यापार समझौते से भारतीय व्यवसायों तथा कृषि को चीन व सिंगापुर जैसे बड़े निर्यातक देशों से असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है ।

व्यापार घाटा

  • विश्व के लगभग सभी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के साथ पूर्वी भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार घाटे में चल रहा है ।
  • 15 आरसीईपी देशों में से कम से कम 11 देशों के साथ भारत का व्यापार गंभीर रूप से घाटे की स्थिति में है । इन देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा पिछले पांच - छह वर्षों में लगभग दोगुना हो गया है ।
  • वित्तीय वर्ष 2018 - 19 के अनुसार आरसीईपी देशों के साथ भारत के 105 बिलियन अमेरिकी डॉलर के व्यापार घाटे में से ,केवल चीन के साथ लगभग 53 बिलियन डॉलर का व्यापार घाटा है । यह भारत के लिए आरसीईपी में शामिल न होने के प्रमुख कारणों में से एक है ।

आयात में वृद्धि

आरसोईपी पर हस्ताक्षर करने पर भारत को अगले 15 वर्षों में सकता है । आयात होने वाले लगभग 90 प्रतिशत माल पर टैरिफ शुल्क में कटौती करने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है । इसके परिणामस्वरूप भारतीय बाजार सस्ते आयातित सामानों से भर जाएगा तथा विशेष रूप से चीन के उत्पादों से भारतीय घरेलू बाजार को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है ।

माल की उत्पत्ति वाले स्थान संबंधी नियम

टैरिफ शुल्कों में अंतर के कारण माल की उत्पत्ति वाले स्थान संबंधी नियम ( Rules of Origin ) से भारतीय निर्माताओं को नुकसान हो सकता है । उदाहरण के लिए चीन द्वारा उत्पादित माल दूसरे देशों के माध्यम से भारतीय बाजार में आ सकते हैं जिसे रोकने के लिए भारत मूल स्थान पर उत्पादित नियमों का सख्ती से पालन चाहता है ताकि ऐसे माल को कम या बिना टैरिफ शुल्क के भारतीय । बाजार तक पहुँच प्राप्त न हो सके ।

आधार वर्ष

भारत , टैरिफ को कम करने के लिए 2013 को आधार वर्ष के रूप में मानने के प्रस्ताव के विरोध में है । भारत चाहता है कि सदस्य देशों को उत्पादों पर आयात शुल्क को कम करनाचाहिए और प्रभावी रूप से 2013 के अनुसार आयात शुल्क नहीं तय किया जाना चाहिए । भारत 2019 को आधार वर्ष के रूप में मानने पर जोर दे रहा है क्योंकि कपड़ा एवं इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों जैसे कई उत्पादों पर पिछले छह वर्षों में आयात शुल्क बढ़ गया है ।

भारत के लिए बाजार पहुंच का अभाव

व्यापार समझौता भारत के बाजार को खोल देगा लेकिन भारत के लिए चीन जैसे बाजारों तक पहुँच प्राप्त करने का कोई प्रावधान नहीं किया गया है ।

* भारत ने वरीयता वाले देश (Most Favoured Nation ) के प्रावधान के औचित्य पर भी प्रश्न उठाया है । जहां भारत आरसीईपी में शामिल देशों को उसी तरह के लाभ देने के लिए मजबर होगा जो वह केवल वरीयता वाले देश को देता है ।

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